साल के आखिर में लोग calendar बदलते हैं।
मैंने खुद को बदला।
रात के करीब ढाई बजे, जब शहर की आवाज़ें धीमी पड़ जाती हैं और दिमाग की आवाज़ें तेज, तब 2025 मेरे सामने बैठा था। बिना मुस्कान के। बिना सहानुभूति के।
जैसे कह रहा हो, “लिखो, लेकिन झूठ मत लिखना।”
ये साल किसी motivational पोस्ट जैसा नहीं था।
ये साल एक खुला घाव था, जो भर भी रहा था और चुभ भी रहा था।
कुछ सुबहें थीं जब उठने का मन नहीं था।
कुछ शामें थीं जब खुद पर यकीन लौट आया।
और इन दोनों के बीच जो हुआ, वही असली कहानी है।

असली शुरुआत जनवरी में नहीं हुई
लोग सोचते हैं साल की कहानी जनवरी से शुरू होती है।
बकवास।
मेरी 2025 की असली शुरुआत उस दिन हुई जब मैंने मान लिया कि मैं थक चुका हूँ।
नाटक करके strong बनने से।
ना कोई बड़ा ऐलान।
ना कोई dramatic फैसला।
बस एक अंदर की आवाज़ जिसने कहा, “अब और खुद से झूठ मत बोल।”
तभी समझ आया कि growth पोस्टर में नहीं होती।
वो चुपचाप अंदर हड्डियाँ खिसकाती है।
Calendar चलता रहा।
Bills आते रहे।
और लोग advice देते रहे, जैसे उन्हें सब पता हो।
यहाँ कड़वा सच लिख देता हूँ।
अधिकतर लोग advice इसलिए देते हैं क्योंकि उन्हें खुद के फैसलों पर भरोसा नहीं होता।
ऊँचाइयाँ जिनमें खुशी के साथ डर भी था
2025 ने कुछ जीतें दीं।
लेकिन साफ कर दूँ, वो वैसि जीतें नहीं थीं, जैसा मैंने सोचा था।
एक दिन ऐसा भी आया जब मेहनत का result दिखा।
काम चला।
नाम चला।
पैसा भी आया।
लेकिन उसी रात डर भी आया।
“अगर ये फिर चला गया तो?”
Success ने confidence दिया।
और anxiety भी।
पहली बार समझ आया कि जीत हमेशा हल्की नहीं होती।
कभी-कभी वो जिम्मेदारी बन जाती है।
सबसे यादगार पल कोई बड़ा deal नहीं था।
एक इंसान का message था।
“तुम्हारी बात ने मुझे गलत कदम से रोक लिया।”
वो line पैसे से भारी थी।
क्योंकि वो real थी।
Confidence धीरे-धीरे आया।
बिना शोर के।
उन दिनों में जब कोई देख नहीं रहा था।
जब कोई ताली नहीं बजा रहा था।
Consistency glamorous नहीं होती।
लेकिन वही टिकाती है।
गिरावटें जो सिर्फ नीचे नहीं ले गईं, खोल भी गईं
अब सच की बात करते हैं।
2025 में मैं गिरा।
एक बार नहीं। कई बार।
गलत फैसले लिए।
जल्दबाज़ी में भरोसे बाँटे।
कुछ लोगों को अपनी तरफ समझ लिया।
वो बस अपनी तरफ थे।
कई रातें ऐसी थीं जब दिमाग बंद ही नहीं होता था।
सोचें घूमती रहीं।
“अगर वो फैसला अलग होता तो?”
Ego ने चोट खाई।
और अच्छा हुआ।
क्योंकि ego जब टूटता है, तब जगह बनती है।
लोग कहते हैं गिरावट इंसान को मजबूत बनाती है।
सच यह है कि पहले वो खाली करती है।
थकान आई।
Burnout आया।
और तब समझ आया कि आराम luxury नहीं है।
जरूरत है।
मैं रुका।
जानबूझकर।
काम से नहीं भागा।
खुद से भागना छोड़ा।
पैसा गया।
कुछ मौके भी गए।
लेकिन साथ में कुछ भ्रम भी चले गए।
और वही सबसे बड़ा फायदा था।

बीच का समय, जहाँ कोई कहानी नहीं बनती लेकिन इंसान बनता है
साल का middle हिस्सा boring था।
पूरी तरह।
ना बड़ी हार।
ना बड़ी जीत।
बस रोज़ उठना।
काम करना।
खुद को संभालना।
यहीं मैंने कुछ ज़रूरी बातें सीखीं।
हर चीज़ का जवाब देना ज़रूरी नहीं।
हर मौका पकड़ना भी नहीं।
“ना” कहना guilt के बिना।
“हाँ” कहना डर के बिना।
मैंने कम किया।
लेकिन साफ किया।
Goal छोटे हुए।
Direction साफ हुई।
Comparison छोड़ा।
क्योंकि दूसरों की race में दौड़ते हुए अपनी सांस खत्म हो रही थी।
यहीं boring systems बने।
Routine।
Limits।
Rules।
ये glamorous नहीं थे।
लेकिन इन्होंने साल को गिरने नहीं दिया।
Jab mann saath na de, tab bhi kaise tike rahein
लोग, रिश्ते और सच्चाई की छंटनी
2025 ने रिश्तों की परीक्षा ली।
बिना warning।
कुछ लोग तब तक थे जब तक मैं काम का था।
फिर गायब।
कुछ लोग तब भी थे जब मैं चुप था।
थका था।
खराब मूड में था।
Family के साथ टकराव भी हुआ।
और समझ भी।
अब बात कम होती है।
लेकिन साफ होती है।
Love दिखावे से बाहर निकला।
Real life में आया।
Grand gestures नहीं।
Small consistency।
सुनना, समझना, और चुप रहना जब ज़रूरत हो।
एक बात साफ हो गई।
अकेले सब कर लेने वाली सोच सिर्फ ego को खुश करती है।
इंसान को नहीं।
काम और पैसे को लेकर जो सच देर से समझ आया
अब practical हिस्से पर आते हैं।
2025 ने दिखाया कि मेहनत हमेशा तुरंत reward नहीं देती।
और समझदारी भी हर बार सही नहीं लगती।
मैंने shiny ideas के पीछे दौड़ लगाई।
थक गया।
एक चीज़ पर टिक गया।
सांस लौटी।
Income uneven थी।
खर्च regular।
तभी समझ आया कि पैसा discipline मांगता है, excitement नहीं।
Track करना सीखा।
Save करना सीखा।
और बिना guilt खर्च करना भी।
एक और सच।
Trend पकड़ने में खुद को खो देते हैं।
Skill पकड़ने में खुद को पाते हैं।
Skill क्यों लंबे समय तक साथ देती है
उल्टा सच जो 2025 ने सिखाया
दुनिया कहती है तेज़ भागो।
2025 ने कहा रुक कर देखो।
Speed से ज़्यादा ज़रूरी है direction।
और direction clarity से आती है।
मैंने जानबूझकर slow किया।
और वहीं से चीज़ें ठीक होने लगीं।
लोगों ने कहा drive खत्म हो गई।
असल में noise खत्म हुई थी।
शांति कमजोर नहीं बनाती।
वो सटीक बनाती है।
कुछ जख्म जो अब भी याद दिलाते हैं
सब कुछ ठीक नहीं हुआ।
और होना भी नहीं था।
कुछ trust issues बचे हैं।
कुछ डर भी।
कुछ emails अब भी बेचैन करते हैं।
कुछ फैसलों से पहले दिल रुकता है।
लेकिन अब मैं उनसे लड़ता नहीं।
उन्हें सुनता हूँ।
क्योंकि जख्म कहानी बताते हैं।
और कहानी दोहराने से बचाती है।
2026 में क्या लेकर जा रहा हूँ
2025 ने बहुत छीना।
लेकिन बदले में clarity दी।
कम लोग।
कम शोर।
कम भागदौड़।
ज़्यादा ईमानदारी।
ज़्यादा फोकस।
ज़्यादा सुकून।
सीधी बात लिखकर खत्म करता हूँ।
अब perfect साल नहीं चाहिए।
बस ऐसा साल चाहिए जिसमें खुद से नज़र मिला सकूँ।
और 2025 ने ये सिखा दिया।
FAQ
दिन पर depend करता है। कुल मिलाकर, real था। ऐसा जो इंसान बदल देता है।
उन plans को छोड़ना जिनसे प्यार था। Attachment ज्यादा दर्द देता है।
हाँ।
खुद को रुकने की इजाज़त देना।
हर आवाज़ का जवाब न देना।
कम लोगों के साथ ज़्यादा सच्चा रहना।
नींद, शांति और दिमाग की सफ़ाई को काम से ऊपर रखना।
और सबसे अहम, जब दिल कहे “बस”, तब रुक जाना… बिना guilt, बिना सफ़ाई।
क्योंकि उसी एक फैसले ने मुझे बचाया है।


