Jab mann saath na de, tab bhi kaise tike rahein

सुबह आंख खुली, फोन की स्क्रीन जली, दिमाग बोला आज कुछ नहीं होगा.
फिर भी उठना पड़ा.
यहीं से कहानी शुरू होती है.

कोई मोटिवेशन वीडियो नहीं चल रहा था.
कोई जोशीला गाना नहीं बजा.
मन खाली था, जैसे बारिश के बाद सूखी मिट्टी.
फिर भी पैर जमीन पर टिके रहे.
यही असली लड़ाई है.

सच बोलूं तो जो लोग हर दिन जोश-जोश की बातें करते हैं, वो आधी सच्चाई बेचते हैं.
यहां कड़वा सच है.
ज़िंदगी ज़्यादातर दिनों में बिना मन के चलती है.

जब मन साथ न दे तब भी टिके रहने की स्थिति दिखाता हुआ व्यक्ति

मन नहीं है, फिर भी काम क्यों जरूरी है

सबसे पहले ये साफ कर लें.
मन कोई राजा नहीं है.
वो बस एक मौसम है.

आज धूप, कल कोहरा.
अगर हर काम मन के हिसाब से करेंगे, तो ज़्यादातर काम अधूरे रहेंगे.
यह कोई किताबों की लाइन नहीं है.
यह रोज की थकान से निकला सच है.

देखो, किसान मन से नहीं बोता.
मजदूर मन से नहीं उठाता बोझ.
मां मन से नहीं जगती आधी रात.
फिर भी सब चलता है.

अब यहां एक बात चुभेगी.
अगर मन न होने पर आप रुक जाते हो, तो दिक्कत मन में नहीं, आदत में है.

और हां, यह कोई सेल्फ-हेल्प का गुलाबी पोस्ट नहीं.
यह ज़मीन से सटा हुआ तर्क है.

अब असली बात

अब सुनो ध्यान से.
मन साथ नहीं देता क्योंकि आपने उसे ज़्यादा सुनना शुरू कर दिया है.

हर ख्याल पर रुकना, हर थकान पर बैठ जाना, हर डर पर पलटना.
यहीं खेल बिगड़ता है.

दिमाग बोलता है आज छोड़ दे.
शरीर कहता है बस पांच मिनट और.
आप मान लेते हो.

लेकिन यहां सवाल ये है.
क्या हर बात माननी जरूरी है?

अब यहीं पर एक छोटा सा ब्रेक.
सोचो.
फिर आगे बढ़ते हैं.

छोटा सिस्टम, बड़ा असर

जब मन नहीं करता, बड़े लक्ष्य बोझ बन जाते हैं.
तो बड़े लक्ष्य हटाओ.
छोटे काम पकड़ो.

आज पूरा पहाड़ नहीं चढ़ना.
आज सिर्फ जूते पहनने हैं.

सुनने में अजीब है.
पर काम करता है.

कुर्सी खींचो.
लैपटॉप खोलो.
फाइल खोलो.
बस.

अक्सर मन रास्ते में आ जाता है, शुरुआत में नहीं.

यहीं लोग गलती करते हैं.
वो पहले मन ढूंढते हैं, फिर काम.
सही तरीका उल्टा है.

काम करो.
मन पीछे-पीछे आएगा.

अगर नहीं आया, तब भी फर्क नहीं पड़ता.

अब यहां एक कड़वी लाइन

प्रेरणा इंतजार करने वालों के घर नहीं आती.
वो चलते लोगों के रास्ते में मिलती है.

और नहीं, ये कोई पोस्टर वाली बात नहीं.
ये उन लोगों की कहानी है जो चुपचाप टिके रहे.

दर्द से दोस्ती करो

अब एक अजीब सलाह दूंगा.
दर्द से भागो मत.

जब मन नहीं करता, तब एक भारीपन आता है.
सीने में.
कंधों में.
आंखों में.

उसे दुश्मन मत समझो.
वो बस संकेत है कि आप कुछ असली कर रहे हो.

आराम वाला रास्ता हमेशा हल्का लगता है.
पर खोखला होता है.

जो टिके रहते हैं, वो दर्द को पहचानते हैं.
उससे बात करते हैं.
और कहते हैं चल साथ में चलते हैं.

यहीं पर लोग टूटते हैं या मजबूत बनते हैं.

अब एक जरूरी मोड़

अब तक जो बोला, वो अकेले टिके रहने की बात थी.
पर इंसान मशीन नहीं है.

हर बोझ अकेले नहीं उठता.

इसलिए एक जगह यहां रुककर सोचो.
कौन है जिससे बिना सजावट के बात कर सकते हो?

एक दोस्त.
एक भाई.
एक पुराना यार.

जो बस सुने.
सलाह न दे.
ज्ञान न बांटे.

यही जगह है जहां आप खुद को फिर से जोड़ते हो.

यहां एक लिंक फिट बैठेगा.
Skill क्यों लंबे समय तक साथ देती है

अब बात करेंगे आदतों की

मन रोज नहीं आएगा.
आदत रोज आएगी.

अगर आपकी सुबह एक तय ढांचे में चलती है, तो मन का रोल कम हो जाता है.

उठो.
पानी पियो.
थोड़ा चलो.
काम शुरू.

कोई सवाल नहीं.
कोई बहस नहीं.

मन बहस चाहता है.
आदत आदेश मानती है.

फर्क समझो.

अब यहां लोग बड़ी गलती करते हैं

वो खुद को कोसते हैं.

आज कुछ नहीं हुआ.
मैं बेकार हूं.
मुझसे नहीं होगा.

रुको.
यहीं सब गड़बड़ है.

आप खराब नहीं हो.
आप थके हुए हो.

और थकान कोई अपराध नहीं.

खुद से बात ऐसे करो जैसे किसी अपने से करते.

डांट नहीं.
धक्का नहीं.
बस साथ.

अब उल्टी सोच वाली बात

अधिकतर लोग कहते हैं मन ठीक करो, फिर काम करो.
यहां सच्चाई उल्टी है.

काम करो, मन ठीक होने लगेगा.

हर बार नहीं.
पर कई बार.

और कई बार काफी होते हैं.

यह वही जगह है जहां ज़्यादातर लोग हार मान लेते हैं.
और कुछ लोग बस टिके रहते हैं.

टिके रहने का एक देसी तरीका

जब कुछ करने का मन न हो, तब खुद से एक सवाल पूछो.

आज अगर मैं नहीं किया, तो क्या होगा?

अक्सर जवाब आता है कुछ नहीं.
पर गहराई में देखो.

एक दिन नहीं.
दस दिन.
तीस दिन.

यहीं डर दिखता है.
और वही डर आपको कुर्सी से उठाता है.

डर बुरा नहीं है.
उसे सही दिशा दो.

यहां एक और लिंक जमेगा.
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जब सब कुछ भारी लगे

ऐसे दिन आएंगे जब कोई लाइन काम नहीं करेगी.
कोई तर्क नहीं जमेगा.
कोई तरीका नहीं चलेगा.

उन दिनों एक ही नियम है.

कम करो.
पर बंद मत करो.

पांच मिनट.
बस पांच.

कई बार वही पांच मिनट जिंदगी बचा लेते हैं.

आखिर में एक सख्त सच

जो लोग टिके रहते हैं, वो खास नहीं होते.
वो बस रुकते नहीं.

उनका मन भी टूटता है.
उनकी भी आंखें भारी होती हैं.
उनका भी दिल बैठता है.

फर्क बस इतना है.
वो कुर्सी नहीं छोड़ते.

और वही फर्क सालों बाद कहानी बनता है.

उल्टी समझ जो दिमाग घुमा दे

सब कहते हैं खुद को सुनो.
मैं कहता हूं हर बात मत सुनो.

कुछ ख्याल थके हुए दिमाग की आवाज होते हैं, सच्चाई नहीं.

हर सिग्नल पर ब्रेक नहीं लगाते.
वरना गाड़ी मंजिल तक नहीं पहुंचती.

FAQ

अगर मन रोज ही नहीं करता तो क्या मैं गलत हूं?

नहीं.
अगर मन रोज नहीं करता, तो तुम गलत नहीं हो. बिल्कुल भी नहीं.
मन का न होना कमजोरी नहीं है.
रुक जाना कमजोरी है.

जब बहुत भारी लगे तब क्या करूं?

बड़ा कुछ मत करो, छोटा पकड़ो, पानी पी लो, खड़े हो जाओ, शुरुआत अपने आप बन जाएगी.

क्या बिना मन के किया काम बेकार होता है?

नहीं.
बिना मन के किया काम बेकार नहीं होता.
असल में कई बार वही काम सबसे काम का निकलता है.

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