Movie Reviews

The Vvaan Review 2026: द वन पैसा वसूल है या नहीं?

1.5/5
admin 7 min read

ओपनिंग धमाका

भाई, अगर रहस्यमयी जंगल, बिहार की लोककथा और सिद्धार्थ मल्होत्रा को एक ही थाली में परोसकर आपको लगा कि आज तो मजा आएगा, तो जरा प्लेट नीचे रखिए।

क्योंकि यह फिल्म कई जगह ऐसी चलती है जैसे कहानी लिखते-लिखते लेखक ने कहा हो, “चलो भाई, अब कुछ भी डाल दो।”

The Vvaan Review 2026

माजरा क्या है?

कहानी बिहार की एक लोककथा और एक रहस्यमयी जगह के इर्द-गिर्द घूमती है। सिद्धार्थ का किरदार लंबे समय बाद अपनी जड़ों वाली जगह पर वापस आता है।

वहां उसे बताया जाता है कि एक खास जगह पर जाना मना है और सूर्यास्त के बाद वहां जाना खतरे से खाली नहीं है।

यहीं से कहानी रहस्य, जंगल और लोकविश्वास के बीच घूमने लगती है। फिल्म की दुनिया बिहार की संस्कृति और लोककथा से जुड़ने की कोशिश करती है, जबकि छठी मैया से जुड़ा गाना भी इसी सांस्कृतिक दुनिया का हिस्सा है। फिल्म का आधार बिहार के बिहटा इलाके के करीब 400 साल पुराने वन देवी मंदिर की लोककथा से जुड़ा बताया गया है।

क्या बवाल था

  • बिहार की लोककथा को बड़े पर्दे पर लाने की कोशिश
    आइडिया सुनने में बढ़िया है। बॉलीवुड अक्सर विदेशी जंगल खोजता फिरता है, यहां कम से कम अपने देश की लोककथा के दरवाजे पर दस्तक तो दी गई है।
  • फिल्म की दुनिया में देसी रंग
    छठ और बिहार की संस्कृति को कहानी की दुनिया में जगह दी गई है। “अपने आंगन की मिट्टी उठाकर फिल्म बनाना” वाला इरादा कम से कम नजर आता है। छठी मैया गाना भी इसी कोशिश का हिस्सा है।
  • सूर्यास्त के बाद वाला रहस्य
    फिल्म का सबसे सीधा और पकड़ बनाने वाला विचार यही है कि एक ऐसी जगह है जहां सूर्यास्त के बाद जाना मना है। इस एक नियम में रहस्य पैदा करने की ताकत है।
  • सिद्धार्थ और तमन्ना की जोड़ी
    दोनों पहली बार इस तरह की लोककथा वाली दुनिया में साथ नजर आते हैं। जोड़ी का नया होना अपने आप में दिलचस्प है, भले फिल्म उस जोड़ी के आसपास कोई बड़ा तूफान खड़ा नहीं कर पाती।

कहानी में कहाँ कमी रह गई

  • सबसे बड़ी दिक्कत कहानी की विश्वसनीयता है
    लोककथा को फिल्म बनाना और लोककथा को बस स्क्रीन पर रख देना, दोनों अलग बातें हैं। यहां कई जगह कहानी को गहराई देने के बजाय जल्दी-जल्दी आगे बढ़ाने का एहसास होता है। खिचड़ी में मसाला तो है, लेकिन चम्मच चलाते ही समझ आता है कि नीचे चावल अभी पके नहीं।
  • बिहार से जुड़ाव ऊपर-ऊपर लगता है
    फिल्म बिहार की जमीन और लोककथा से जुड़ती है, लेकिन जिस गहराई से इस रिश्ते को दिखाया जा सकता था, वहां फिल्म पीछे रह जाती है। अगर किसी कहानी की जड़ बिहार में है, तो सिर्फ नाम और माहौल काफी नहीं होता। मिट्टी की खुशबू भी कहानी में आनी चाहिए।
  • कभी-कभी करण अर्जुन वाला एहसास आता है
    फिल्म कुछ हिस्सों में भाईचारे और बड़े भावनात्मक टकराव का वजन पैदा करना चाहती है, लेकिन असर उतना नहीं बैठता। इरादा बड़ा, नतीजा थोड़ा हल्का।
  • सिद्धार्थ का किरदार खुद फिल्म को खींच नहीं पाता
    उनसे जिस तरह की पकड़ की उम्मीद की जाती है, वह यहां लगातार नहीं बनती। कई जगह ऐसा लगता है कि किरदार कहानी के पीछे चल रहा है, कहानी को आगे नहीं खींच रहा।
  • फिल्म को थोड़ा और समय चाहिए था
    इस तरह की लोककथा में दुनिया बनाना जरूरी होता है। यहां कई जगह ऐसा लगता है कि मेकर्स ने जड़ तक जाने के बजाय सीधे पेड़ दिखाने की कोशिश कर दी।

एक्टिंग का रिपोर्ट कार्ड

सिद्धार्थ मल्होत्रा: पास होने लायक, लेकिन नंबर कम
उनके किरदार में रहस्य और भावनात्मक वजन होना चाहिए था, लेकिन प्रदर्शन उतनी मजबूती से फिल्म को ऊपर नहीं उठा पाता।

तमन्ना भाटिया: सप्लीमेंट्री आ गई
तमन्ना फिल्म में हैं, लेकिन उनके अभिनय पर अलग से कोई बहुत खास बात निकालने लायक असर यहां नजर नहीं आता। उनका किरदार कहानी में मौजूद है, मगर फिल्म की सबसे बड़ी ताकत नहीं बनता।

स्पॉइलर ज़ोन

चेतावनी: अब कहानी के अहम हिस्से खुलेंगे। यहां से आगे पढ़ना है तो अपने रिस्क पर।

फिल्म का मूल खेल उस रहस्यमयी जगह और उससे जुड़े लोकविश्वास के आसपास है। सिद्धार्थ का किरदार अपनी जड़ों से जुड़े इलाके में लौटता है, जबकि आसपास के लोग उसे उस जगह से दूर रहने की सलाह देते हैं।

खास बात यह है कि सूर्यास्त के बाद वहां जाना मना है। यही नियम कहानी के रहस्य को आगे बढ़ाता है और फिल्म इसी लोकविश्वास को बड़े पर्दे के खतरे में बदलने की कोशिश करती है।

लेकिन दिक्कत यहीं शुरू होती है। जिस लोककथा में इतना माल था, फिल्म उससे उतना गहरा रिश्ता नहीं बना पाती। आपको बार-बार लगता है कि भाई, कहानी यहां कुछ और बड़ा कर सकती थी।

फिल्म कभी भाईचारे और पुराने रिश्तों वाली भावनात्मक फिल्म जैसा रंग पकड़ने की कोशिश करती है, तो कभी रहस्यमयी जंगल की तरफ मुड़ जाती है। नतीजा यह कि दोनों रास्ते पूरी तरह खुल नहीं पाते।

बिहार का जुड़ाव भी इसी वजह से खटकता है। फिल्म जिस जमीन और लोककथा से प्रेरित है, उसके साथ और गहरा रिश्ता बनाया जाता तो कहानी ज्यादा असरदार हो सकती थी।

फिल्म की रिलीज से पहले सिद्धार्थ और तमन्ना पटना जाकर प्रचार भी कर चुके हैं। वहां उन्होंने मंदिरों में दर्शन किए और छठ से जुड़ी गतिविधियों में हिस्सा लिया।

और हां, जिस समय बिहार बाढ़ से बुरी तरह प्रभावित था, उस समय राज्य में लाखों लोग प्रभावित बताए गए थे। इसलिए फिल्म के बिहार प्रचार को लेकर संवेदनशीलता का सवाल उठना स्वाभाविक है।

यानी मामला सिर्फ फिल्म का नहीं है। जब आप किसी जगह की लोककथा और संस्कृति को अपनी फिल्म का आधार बनाते हैं, तो उस जगह से आपका रिश्ता स्क्रीन के बाहर भी सवालों के घेरे में आता है।

बस यही वह जगह है जहां फिल्म और बेहतर हो सकती थी।

स्पॉइलर ज़ोन ख़त्म

फाइनल रेटिंग

कहानी/स्क्रीनप्ले: 1.5/5
आइडिया अच्छा है, लेकिन कहानी को जितनी गहराई चाहिए थी, उतनी नहीं मिलती।

डायरेक्शन: 2/5
लोककथा वाली दुनिया बनाने की कोशिश है, मगर कई जगह पकड़ ढीली पड़ जाती है।

एक्टिंग: 1.5/5
सिद्धार्थ फिल्म को संभाल नहीं पाते और तमन्ना को भी उतनी मजबूत जगह नहीं मिलती।

म्यूजिक/BGM: 2/5
छठी मैया जैसा गाना फिल्म की सांस्कृतिक दुनिया से जुड़ता है, लेकिन पूरे संगीत पर कोई ठोस फैसला देने जितनी चर्चा यहां नहीं मिलती।

एंटरटेनमेंट वैल्यू: 1.5/5

ओवरऑल: ⭐⭐ 1.5/5 | “टिकट के पैसे बचा लो”

देखें या ना देखें?

अगर आपको लोककथा, रहस्य और बिहार की संस्कृति में खास दिलचस्पी है तो एक बार जिज्ञासा में देख सकते हैं।

लेकिन सिर्फ टाइमपास के लिए थिएटर जाने की सोच रहे हैं, तो पॉपकॉर्न के साथ नींद भी फ्री मिल सकती है।

फिल्म देखने जा रहे हो तो कम से कम इतना याद रखना, जंगल में रास्ता भटकना ठीक है, लेकिन टिकट खिड़की पर पैसा भटकाना नहीं।

Leave a response

Your email address will not be published. Required fields are marked *